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Year : 2017 | Volume : 5 | Issue : 2 | Page : 47 - 47  


Poem
दुकान ए मच्छर

Dr. Sagar Borker

Assistant Professor PSM PGIMER and Dr RML hospital Medical College New Delhi 110001 India

Email: sagarborker@gmail.com

चहक रहा है सावन

सुनके मेरी सयगभ

खून आज खूब पियूँगी

जगह जगह है शबनम

पंखो पर है बाघ सा रंग

दिल्ली शहर मे पूरी है मेरी तरंग

छोटी सी उड़ान है जनाब

दर्द, ज्वर चकत्ते का नहीं कोई हिसाब

गंदे पानी में घर बनाऊ

काट काटकर पैर सुजाऊ

थमे रक्त की तेरी धरा

फिर न होवे दिन उजियारा

ज्वर से कॅपकॅपाये तेरा बदन

भीषण बीमारी के यही है लक्षन

कायदे कानून मैं बनवउँ

गोलियोंसे नहीं अब होवे रक्षण

जापानी ज्वर, पित्त ज्वर, पश्चिम निल नदी बुखार, चिकनगुनया, डेंगू , ज़्हीका

ज्वारों के नाम है अनेक

टायर , पौधे, टंकी के पानी में अंडे डालू

कारण मात्र है सिर्फ एक

बदबू, गन्दगी, लाचारी, कीचड़, कचरा, शौच

सबका उठाऊ मैं पूरा फायदा

बच्चा, जवान, बुजुर्ग, नारी किसीको न बक्शु

करू मैं यह पक्का वायदा

सरहदे, फासले ,मैं न नपु

थोड़ा सा भी पानी जल्द से भपु

दुकान है मेरी सारे जहाँ मे ख्याति प्राप्त छाई

तेरी खुदगर्जी का जीता जगता उदाहरण हू





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